1.10.17

पहले स्नैपचैट को बेचा 351 करोड़ में एप, अब दुनिया घूमकर कमा रहा है लाखों



नई दिल्ली.  अक्सर आपने सुना होगा समुचित फंड जुटाने के बाद लोग दुनिया घूमने के लिए निकलते हैं। लेकिन क्या आपने सुना है कि कोई शख्स अपना स्टार्ट अप बेच फैमिली के साथ दुनिया घूमकर पैसे कमा रहा है? नहीं, तो हम आपको बता रहे हैं ऐसे शख्स के बारे में जिसने अपना एप, स्नैपचैट को 5.4 करोड़ डॉलर (351 करोड़ रुपए) में बेच दिया और अब दुनिया घूमकर लाखों में कमाई कर रहा है।

351 करोड़ में बेच दी स्टार्ट अप

28 वर्षीय गारेट जी ने 2011 में तीन दोस्तों के साथ के साथ मिलकर मोबाइल स्कैनिंग एप 'स्कैन' को डेवलप किया। कुछ ही समय में यह एप काफी पॉपुलर हो गया। लेकिन कुछ समय बाद इस काम में गारेट का मन ऊब गया और उन्होंने इसे बेचकर अपने घर लौटने का फैसला किया। 2014 में गारेट ने अपने एप को स्नैपचैट को 5.4 करोड़ डॉलर में बेचकर अपने घर लौट गए।

घर का सामान बेचकर जुटाए 29 लाख

एप बेचने के बाद गारेट ने कुछ अलग करने का फैसला किया। घूमने के शौकीन रहे गारेट ने पूरे परिवार के साथ दुनिया घूमने का निर्णय लिया। एप बेचकर कमाए पैसे को उन्होंने अपने बचत खाते में डाल दिया और उसमें से खर्च नहीं करने का फैसला किया। फैमिली के साथ 6 महीने के ट्रिप के लिए घर का सामान बेचकर 45,000 डॉलर (29 लाख रुपए) जुटाए।


अभी तक 45 देश घूम चुके जी ने अपनी बचत में से एक पैसे भी खर्च नहीं किए हैं। दुनिया भ्रमण के दौरान उन्होंने एडवेंचर को ब्लॉग के जरिए किया। सोशल मीडिया अकाउंट खोले और विभिन्न ब्रांड्स के स्पॉन्सर्ड कंटेट और पार्टनरशिप के लिए काम कर पैसे कमाए। हाल ही में इस फैमिली ने वाल्ट डिजनी के साथ पार्टनरशिप की और एक महीने तक डिजनी रिसॉर्ट होलट में ठहरकर उसका प्रोमेशन किया।


दुनिया घूमकर कमाई कर रहे जी ने कई कंपनियों के साथ बिजनेस पार्टनरशिप कर रखी है। गोप्रो, एयरबीएनबी, होटल और गार्मेंट ब्रांड्स के साथ उनका टाईअप है। जी एक स्पॉन्सर्ड यूट्यूब वीडियो के लिए 10000 से 20000 डॉलर यानी 6.5 लाख से 13 लाख रुपए वसूलते हैं। इसके अलावा स्पॉन्सर्ड इंटाग्राम पोस्ट के जरिए 5000 से 8000 डॉलर यानी 3.25 लाख से 5.2 लाख रुपए की कमाई करते हैं।


27.9.17

32 लाख की जॉब छोड़ 13000 युवाओं को बनाया एंटरप्रिन्योर



टाटा कम्युनिकेशन में रीजनल हेड और डीजीएम का पद, 32.5 लाख रुपये का सालाना पैकेज। इज्जत, दौलत, और शोहरत सबकुछ था दिल्ली के पुनीत रमन के पास लेकिन उन्होंने अपनी पसंद का काम करने के लिए एक झटके में इन सबको छोड़ दिया। पुनीत रविवार को हरकोर्ट बटरल टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एचबीटीयू) में एंटरप्रिन्योरशिप वर्कशॉप को संबोधित करने आए थे।
उन्होंने ‘अमर उजाला’ से कानपुर में बातचीत के दौरान अपनी सक्सेस स्टोरी बताई। बोले, मैंने 12वीं के बाद रामजस में बीकॉम ऑनर्स के लिए एडमिशन लिया लेकिन फेल हो गया। इसके बाद बीकॉम के लिए अप्लाई कर दिया। पास होने के बाद मोटोरोला कंपनी में इंटर्नशिप की। कंपनी को मेरा काम पसंद आया। एक साल बाद मुझे वहीं नौकरी मिल गई। शुरूआत अच्छी थी लेकिन मन में कुछ और ही चल रहा था। पार्ट टाइम एमबीए भी किया।

इसके बाद महिंद्रा, रिलायंस कम्युनिकेशन जैसी कई कंपनियों में काम किया। लास्ट में टाटा कम्युनिकेशन में बतौर रीजनल हेड और डीजीएम नार्थ एंड ईस्ट इंडिया के पद पर काम करने को मिला। 32.5 लाख रुपये सैलरी थी लेकिन मुझे अपना लक्ष्य याद था। मैं कुछ खुद का शुरू करना चाहता था और 2015 में मैंने नौकरी छोड़ दी। एंटरप्रिन्योरशिप और स्टार्ट अप को बढ़ावा देने के लिए खुद की कंपनी प्रोविस्डम ग्रोथ शुरू की। इस कंपनी के जरिए अभी तक वह 13000 युवाओं को एंटरप्रिन्योर बना चुके हैं।

एंटरप्रिन्योर्स को राह दिखाता है प्रोविस्डम
पुनीत ने कानपुर में बताया कि अगर कोई स्टार्ट अप या एंटरप्रिन्योरशिप की तरफ आगे बढ़ रहा है तो वह www.prowisdom.in पर जाकर हर तरह की मदद पा सकता है। प्रोविस्डम एक ऐसी कंपनी है तो एंटरप्रिन्योरशिव और स्टार्ट अप को बढ़ावा देती है। युवाओं के पास अगर अच्छा आइडिया है तो उसे फंडिंग के लिए बड़ी इंडस्ट्री से कोआर्डिनेट कराती है। किसी को मेंटरशिप चाहिए तो वह भी यहां से आसानी से पा सकता है।

पुनीत कहते हैं कि कंपनी की उद्देश्य बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट, स्कूल और कॉलेज सबको एक प्लेटफार्म पर लाना था। वह उन्होंने कर दिखाया। अब स्कूल का स्टूडेंट भी अगर अच्छा आइडिया लाता है तो वह हमारे वेबसाइट के जरिए बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट से कांटैक्ट कर सकता है। इंडस्ट्रियलिस्ट उसे उसके काम में हर संभव मदद देते हैं। फिर वह फंडिंग करना हो या उसे प्रमोट करना।

कभी थे IIT के जानेमाने प्रोफेसर, आज हो गई है ऐसी हालत...



IIT में पढ़ कर अच्छी नौकरी हासिल करना किसका सपना नहीं होता पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनपर समाज को सुधारने का भूत सवार रहता है और उनकी हर एक सांस देश के लिए समर्पित होती है। ऐसे ही एक महानपुरुष है आलोक सागर।

आलोक सागर अगर चाहते तो अपनी हाई एजुकेशन के बलबूते लग्जरी लाइफस्‍टाइल जी सकते थे लेकिन आज हम जिस आलोक सागर को जानते हैं वो IIT का छात्र बाद में है पहले एक समाजसुधारक है।




गुमनामी की जिंदगी गुजार रहे पूर्व RBI गवर्नर रघुराम राजन के गुरु और दिल्ली IIT में प्रोफेसर रहे आलोक सागर का मकसद है समाज में फैले जातिवाद को मिटाकर जरूरतमंदों को मुख्य धारा में लाना और इतनी हरियाली पैदा कर देना है कि आने वाली कई पीढ़ियों को फलदार पेड़-पौधे मिलते रहें।



आलोक सागर की प्रर्सनल और प्रोफेशन लाइफ को देखें तो उनका जन्म 20 जनवरी 1950 को दिल्ली में हुआ। आलोक सागर के पिता IRS अधिकारी थे और माता दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर।

IIT दिल्ली से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग करने के बाद साल 1977 में उन्होंने अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से रिसर्च की डिग्री ली। टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डॉक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वो IIT दिल्ली में प्रोफेसर बन गए। 



लेकिन आलोक का मन तो समाजसुधार के कार्यों मे ज्यादा लगता था ऐसे में IIT में प्रोफेसर की नौकरी छोड़ दी और पिछले 30 सालों से आलोक मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में सालों से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बीता रहे हैं। वे आदिवासियों के लिए सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं।



यदि आलोक सागर के निजी जीवन की बात की जाए तो वो दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं लेकिन इसका असर उनकी जिंदगी पर कभी नहीं पड़ा। आप जानकर हैरान होंगे कि आलोक के पास पहनने के लिए बस तीन कुर्ते हैं और एक साइकिल है।


आलोक आज भी साइकिल से पूरे गांव में घूमते हैं। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना और पौधों की देखरेख करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। उन्‍हें कई भाषाएं बोलनी आती है लेकिन इन सबके बावजूद वो बस इन पिछड़े इलाकों में शिक्षा का प्रसार करने में लगे हैं। आलोक खुद को किसी के लिए प्रेरणास्त्रोत नहीं मानते वो कहते हैं एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर सोचना ठीक नहीं।

19.9.17

छुपा कर अंडरगारमेंट्स सुखाने वाले देश में कैसे सफल हुआ एक ऑनलाइन लॉन्जरी पोर्टल

ज़िवामे की सफलता एक उदाहरण है कि कैसे एक रूढ़ मानसिकता का ध्वंस करके अपने विश्वास के बल पर एक नया काम शुरू किया जा सकता है, न सिर्फ शुरू किया जा सकता है बल्कि उसको सफलता की बुलंदियों पर ले जाया जा सकता है। हर तरफ हो रही ज़िवामे की जयकार के पीछे एक ही महिला का दृढ़निश्चय है, जिसका नाम है रिचा कर।




रिचा ज़िवामे की फाउंडिंग सीईओ हैं। रिचा की इस सफलता के लिए उसे 2014 में फॉर्च्यून इंडिया की ‘अंडर 40’ लिस्ट में शमिल किया जा चुका है। रिचा की कंपनी की वेल्यू आज 270 करोड़ रुपए है। उनका रेवेन्यू सालाना आधार पर 300 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। ज़िवामे के ऑनलाइन लॉन्जरी स्टोर में फिलहाल 5 हजार लॉन्जरी स्टाइल, 50 ब्रांड और 100 साइज हैं। 

रिचा लड़कियों को संदेश देती हैं कि ‘अपनेआप को कभी कम महसूस न करें, अपने पर विश्वास बनाए रखें। साथ ही मेहनत, लगन और धैर्य बनाए रखें, किसी बात से डरे नहीं, उस का समाधान पाने की कोशिश करें।’ रिचा ने अपनी हिम्मत से साबित कर दिया कि अगर इरादे पक्के हों तो लाखों चुनौतियां सामने आ जाएं सफलता मिल ही जाती है।

जिवामे, एक ऑलाइन स्टोर जिसने देश की हजारों लड़कियों और औरतों को उनके अंतर्वस्त्र खरीदने में होने वाली हिचक को दूर कर रहा है। साथ ही ये जागरूकता फैला रहा है कि सही साइज का इनर वियर पहनना स्वास्थ्य के लिए कितना जरूरी होता है। जिवामे हिबूर भाषा का शब्द है, जिस का अर्थ है ‘मुझे कांतिमान बनाएं'। जिवामे की सफलता एक उदाहरण है कि कैसे एक रूढ़ मानसिकता का ध्वंस करके अपने विश्वास के बल पर एक नया काम शुरू किया जा सकता है, न सिर्फ शुरू किया जा सकता है बल्कि उसको सफलता की बुलंदियों पर ले जाया जा सकता है। हर तरफ हो रही जिवामे की जयकार के पीछे एक ही महिला का दृढ़निश्चय है, जिसका नाम है रिचा कर। क्या कोई अंडरगारमेंट ऑनलाइन जाकर खरीदना पसंद करेगा? कुछ बरसों पहले तक यह सवाल थोड़ा अटपटा लगता था लेकिन रिचा ने इस सवाल से एक बड़ा और कामयाब बिजनेस खड़ा कर दिखाया।
रिचा जिवामे की फाउंडिंग सीईओ हैं। रिचा की इस सफलता के लिए उसे 2014 में फॉर्च्यून इंडिया की ‘अंडर 40’ लिस्ट में शमिल किया जा चुका है। आज हर कोई सुंदर दिखना चाहता है। ऐसे में सही इनरवियर का चयन आवश्यक है। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 5 में से 4 महिलाएं अपनी ब्रा का सही साइज नहीं जानतीं, तो 53% महिलाएं बहुत पुरानी ब्रा का इस्तेमाल करती हैं। जबकि 82% महिलाओं ने सही साइज की ब्रा ढूंढ़ने में किसी ऐक्सपर्ट की राय कभी नहीं ली। इसलिए जिवामे के कैंपेन ‘फिट इज माई राइट’ के तहत देश की महिलाएं सही साइज की ब्रा पहनने के बारे में जान सकेंगी और करीब 5 लाख महिलाएं 1 साल में इस अभियान से जुड़ेंगी। 
रिचा का आइडिया इतना क्रांतिकारी था कि एक साल बाद ही बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स ने इनकी कंपनी में इन्वेस्ट करने शुरू कर दिए। आज कई निवेशक उनकी कंपनी में निवेश भी कर रहे हैं जिनमें टाटा, यूनीलेजर वेंचर्स, जोडियस टेक्नोलॉजी फंड और खजानाह नेशनल बेरहद भी शामिल हैं। रिचा की कंपनी की वेल्यू आज 270 करोड़ रुपए है। उनका रेवेन्यू सालाना आधार पर 300 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। जिवामे के ऑनलाइन लॉन्जरी स्टोर में फिलहाल 5 हजार लॉन्जरी स्टाइल, 50 ब्रांड और 100 साइज हैं। कंपनी ट्राई एट होम, फिट कंसल्टेंट, विशेष पैकिंग और बेंगलुरु में फिटिंग लाउंज जैसी ऑफरिंग्स दे रही है। कंपनी इस समय भारत में सभी पिन कोड पर डिलिवरी करती है। अत्यंत नम्र व हंसमुख स्वभाव की रिचा कर हमेशा अपने काम पर फोकस्ड रहीं। यही वजह है कि वे सफल रहीं।

जब मां ने ही जता दिया था अविश्वास

लेकिन उनका लिंजरी की ऑनलाइन कंपनी ओपन करना आसान नहीं था। बतौर रिचा इसको लेकर उनके घर में ही महाभारत हुई, उनकी मम्मी इस बिजनेस को लेकर काफी टेंशन में थीं। रि‍चा ने जब अपनी मां को बताया कि‍ महि‍लाएं दुकान पर जाकर इनरवि‍यर्स खरीदने में हि‍चकि‍चाती हैं, इसलि‍ए मैं ऑनलाइन लिंजरी बेचना चाहती हूं, तो मां नाराज हो गईं और बोलीं कि‍ मैं लोगों को क्या, बताऊंगी कि‍ मेरी बेटी कंप्यूटर पर ब्रा-पैंटी बेचती है। रिचा ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी अपनी पूरी कोशिशें पूरा ध्यान पर अपने लक्ष्य को पूरा करने में लगा दिया जिसका रिजल्ट आज उनके सामने है और वो आज इंडिया की टॉप मोस्ट बिजनेस गर्ल है। 
जमशेदपुर में जन्मी ऋचा ने बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग की और नरसी मोंजी मैनेजमैंट स्टडीज से एमबीए किया। जिसके बाद कर ने स्पैंसर और सैप में जॉब की लेकिन अपनी खुद की कंपनी खोलने के लिए उन्होंने ये नौकरी छोड़ दी। रिचा ने जिवामे की शुरुआत 35 लाख रुपये में की थी। इस रकम को उन्होंने अपने दोस्तों और परिवार वालों से जुटाया था इसमें उनकी अपनी सेविंग्स भी शामिल थी। उनकी कंपनी का पहला ग्राहक इंदौर का जिसने 7,000 रुपये का ऑर्डर दिया था। अब कंपनी इंडिया की लीडिंग ऑनलाइन वेबसाइट स्टोर है जहां से गर्ल्स 5000 से ज्यादा के स्टाइलिश लिंजरी अपने लिए खरीद सकती हैं।

रिचा कहती हैं कि आनेवाले 5-7 साल में मैं जिवामे को 100 करोड़ डॉलर बिजनेस में तब्दील करना चाहती हूं। 32 साल की रिचा मानती हैं कि जब आप कोई बिजनेस शुरू कर रहे होते हैं तो आप अपने परिवार के साथ ज्यादा वक्त नहीं बिता पाते। लेकिन रिचा ने यह सब सोचने के बाद ही स्टार्टअप शुरू करने का फैसला किया। फिलहाल वह सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करती हैं। वह कहती हैं कि मैं पार्टियों में नहीं जाती, सोशलाइज नहीं करती, यहां तक कि मेरे पास पैरंट्स से बातचीत के लिए भी टाइम नहीं है। मैं सिर्फ काम करती हूं। रिचा की शादी एक इंटरनेट प्रफेशनल के साथ हुई है। रिचा ने अपने कैरियर के बारे में ज्यादा कुछ नहीं सोचा था। पर वे ऐसा कुछ जरूर करना चाहती थीं जिस से किसी का लाभ हो सके। उन की यही सोच उन्हें लिंजरी के व्यवसाय में लाई। 

वे बताती हैं, ‘जब मैं ने लिंजरी मार्केट के बारे में पढ़ा तो पता चला कि महिलाएं अकसर अपने अंतर्वस्त्र के बारे में खुल कर बात नहीं करतीं। उन्हें अपनी ब्रा का सही साइज तक पता नहीं होता। वे हमेशा गलत साइज की ब्रा पहनती हैं। दुकान में अगर पुरुष सेल्समैन हो तो झट से खरीद कर निकल जाती हैं। जबकि यह हमारे पहनावे का अहम अंग है। इस के अलावा उम्र होने पर वे ब्रा पहनना छोड़ देती हैं, जिस से उन्हें पीठ व कमर दर्द की प्रॉब्लम हो जाती है। यह सब जान कर मुझे उस क्षेत्र में जाने की प्रेरणा मिली।'



खुद पर यकीन हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं 

फिटिंग के इनरवियर की समझ बढ़ाने के लिए जिवामे का पहला लाउंज बेंगलुरु में खोला गया जहां लाखों महिलाएं अपनी ब्रा ठीक साइज देख कर खरीदती हैं। मुंबई में अनूठा मोबाइल फिटिंग लाउंज खोला गया। इस में 3 ट्रायलरूम व 3 फिटिंग विशेषज्ञ हैं। यह टीम कालेज में पढ़ने वाली हजारों लड़कियों को उन की सही ब्रा साइज बताएगी। यह सुझाव नि:शुल्क होगा। इस के बाद वे ऑनलाइन शॉपिंग के जरीए या रिटेलर के पास जा कर अपनी सही साइज की ब्रा खरीद सकेंगी। ऐसा अनुमान है कि 2015 के अंत तक करीब 5 लाख महिलाएं इस में शामिल हो जाएंगी। मुंबई के बाद यह मोबाइल फिटिंग लाउंज दिल्ली, कोलकाता, चंडीगढ़ और कई और शहरों में होगा। महिलाओं में जागरूकता लाने का यह बड़ा प्रयास है। रिचा लड़कियों को संदेश देती हैं कि ‘अपनेआप को कभी कम महसूस न करें, अपने पर विश्वास बनाए रखें। साथ ही मेहनत, लगन और धैर्य बनाए रखें, किसी बात से डरे नहीं, उस का समाधान पाने की कोशिश करें।’ रिचा ने अपनी हिम्मत से साबित कर दिया कि अगर इरादे पक्के हों तो लाखों चुनौतियां सामने आ जाएं सफलता मिल ही जाती है।

11.9.17

23 की उम्र में ऐसे बना 6000 Cr. का मालिक, कभी सड़क पर बेचता था सिम

आज 6000 करोड़ तक पहुंच गई है। हाल ही में OYO रूम में जापान के सॉफ्टबैंक ने 250 मिलियन डॉलर का निवेश किया है।



नई दिल्ली. आज Oyo Rooms नाम की कंपनी की शुरुआत कर बड़े-बड़े अनुभवी बिजनेसमैन और इन्वेस्टर्स को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। ये कंपनी ओयो रूम्स का काम ट्रैवलर्स को सस्ते दामों पर बेहतरीन सुविधाओं के साथ देश के बड़े शहरों में भी उपलब्ध है। इसकी शुरुआत 17 साल के एक लड़के ने की थी, जिसकी वेल्यू आज लगभग 6000 करोड़ तक पहुंच गई है, और साथ ही साथ इसकी बुकिंग में हर 3 महिने में 30 प्रतिशत की बढ़त हो रही है। हाल ही में OYO रूम में जापान के सॉफ्टबैंक ने 250 मिलियन डॉलर का निवेश किया है। सॉफ्टबैंक का भारत में यह फ्लिपकार्ट के बाद दूसरा सबसे बड़ा निवेश है। कभी किराया देने के लिए नहीं थे पैसे...


- इस कंपनी के फाउंडर रितेश अग्रवाल हैं। जिन्होंने 17 साल की उम्र में इंजीनियरिंग छोड़ इस कंपनी की शुरुआत की।
- ये कंपनी उन्होंने बिना किसी की मदद के शुरू की थी और सिर्फ 6 साल में 6000 करोड़ तक पहुंच गई है।
- इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि उनके पास शुरुआती दिनों में किराया देने के लिए भी पैसे नहीं होते थे और कई रातें उन्होंने सीढ़ियों पर बिताई हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वे सिम कार्ड भी बेचा करते थे।
- रितेश ने एक वेबसाइट तैयार की थी जहां वे सस्‍ते और किफायती होटल्‍स के बारे में जानकारी अपडेट करते थे जिस वेबसाइट का नाम रखा 'ओरावल'।
- जानकारी के मुताबिक रितेश कुछ दिन वेबसाइट चलाने के बाद को लगा कि नाम के कारण लोग वेबसाइट को समझ नहीं पा रहे हैं, इसलिए उन्‍होंने 2013 में उसका नाम बदल कर OYO Rooms रख दिया।


ऐसे आया आइडिया
- सन 2009 में रितेश देहरादून और मसूरी घूमने गए थे। वहां से उन्हें इस बिजनेस के बारे में आइडिया आया। 
- उन्होंने ऑनलाइन सोशल कम्युनिटी बनाने के बारे में सोचा, जहां एक ही प्लेटफॉर्म पर प्रॉपर्टी के मालिकों और सर्विस प्रोवाइडर्स की सहायता से पर्यटकों को रूम और फूड उपलब्ध करा सकें। 
- फिर 2011 में रितेश ने ओरावेल की शुरुआत की। उनके इस आइडिया से गुड़गांव के मनीष सिन्हा ने ओरावेल में निवेश किया और को-फाउंडर बन गए।
- इसके बाद 2012 में ओरावेल को आर्थिक मजबूती मिली, जब देश के पहले एंजल आधारित स्टार्ट-अप एक्सलेरेटर वेंचर नर्सरी एंजल ने उनकी हेल्प की।
- आज पूरे भारत में इसके 8,500 होटलों में 70,000 से भी ज्यादा कमरे हैं।


2 दिन गए थे कॉलेज
- रितेश का जन्म ओडिशा के बिस्सम कटक गांव में हुआ था। रायगड़ा के सेक्रेट हार्ट स्कूल से उन्होंने पढ़ाई की है।
- वे शुरू से ही बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग से इन्सपायर थे और वेदांता के अनिल अग्रवाल को अपना आदर्श मानते हैं।
- रितेश स्कूल स्कूलिंग के बाद आईआईटी में इंजीनियरिंग में एडमिशन लेना चाहते थे लेकिन सफल न हो सके।
- इसके बाद रितेश ने यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में एडमिशन लिया और वहां भी वे सिर्फ दो दिन ही लंदन यूनिवर्सिटी के दिल्ली कैंपस गए थे।
कई समस्याएं थीं सामने
- फंडिंग, मार्केटिंग और प्रॉपर्टी के ऑनर्स और इन्वेस्टर्स तक पहुंचने जैसे उनके सामने भी कई समस्याएं आईं थीं।

- लेकिन टीम वर्क और सही गाइडेंस से वे आगे बड़ते गए और कंपनी को खड़ा किया।
- ओयो ने सॉफ्टबैंक सहित मौजूदा इन्वेस्टर्स और हीरो एंटरप्राइज से 25 करोड़ डॉलर (1,600 करोड़ रुपए से अधिक) की नई फंडिंग की है।
- कंपनी इस फंड का इस्तेमाल भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए करना चाहती है।

27.8.17

18 वर्षीय छात्र ने कर दिया चमत्कार, अब अखबार डिलीवर करेगा उसका 'ड्रोन'

BENGALURU BOY ROHIT DEY BUILDS DRONE THAT CAN DELIVER NEWSPAPERS AT DOORSTEP

रोहित डे

रख हौसला, वो मंजर भी आएगा
प्यासे के पास चल के, समंदर भी आएगा

थक कर ना बैठ, ए मंजिल के मुसाफिर
मंजिल भी मिलेगी और मिलने का मजा भी आएगा।
 
अगर मन मे दृढ़ विश्वास हो और हौसले बुलंद हो तो मंजिल चाहे कितनी ही कठिन हो आसानी से मिल ही जाती है। ऐसे ही बुलंद हौसले की बदौलत बंगलुरु के क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के BSc फर्स्ट ईयर के छात्र रोहित डे ने एक कारनामा कर दिखाया है जो विदेशो में पढ़ने वाले छात्र भी बिना ट्रेनिंग के करने की सोच भी नहीं सकते हैं।

घरों तक अखबार डिलीवर करेगा ये ड्रोन

रोहित डे

रोहित डे ने एक ऐसा ड्रोन बनाया है जो लोगों के घरों तक अखबार डिलीवर करेगा। रोहित ने इस ड्रोन को 'नयन' नाम दिया है। इसका वजन 2.6 किलोग्राम है और लगभग 30 मिनट तक इससे काम किया जा सकता है। 

रोहित ने पिछले कई वर्षों में कई ड्रोन बनाए हैं। उनके बनाए ड्रोनों का इस्तेमाल सर्विलांस, एरियल फोटोग्राफी और फसल की मॉनिटरिंग का काम कर सकते हैं। 

स्मार्टफोन से होता है कंट्रोल

'नयन' इन्वर्टेड रोटर कॉन्सेप्ट के आधार पर काम करता है और इसे स्मार्टफोन से कंट्रोल किया जा सकता है। डे ने पहले ही एक ड्रोन बनाया था लेकिन वो इससे संतुष्ट नहीं थे। अब रोहित को लगता है कि 'नयन' अच्छी तरह से काम कर सकता है।

1.12.16

From Being Termed ‘Ugliest’ Girl to Breaking Stereotypes; This is India’s Iron Woman!

One of India’s strongest bodybuilders and the ‘Iron Lady’, Yashmeen Manak made the country proud yet again by winning the Bronze medal in the Miss Asia Bodybuilding competition. Manak was also crowned as Miss India 2016 held by the Indian Bodybuilding Federation in the month of March this year.
The 36-year-old’s journey as India’s leading bodybuilder started off as a mere mishap. A wrong dosage of medicines in childhood lead to Yashmeen entirely changing her physical appearance as she not just lost enormous amounts of weight, but her facial beauty seemed to fade away as well.
Disheartened by being termed ugly, Yashmeen decided to change her fate by working on her physique to regain her lost beauty instead. Soon, she began to hit the gym on a regular basis and before you knew it, Yashmeen’s interests inclined towards bodybuilding.
Having undergone several certified training courses over the years, Yashmeen soon participated in various bodybuilding competitions around the country. Today, she’s not just an ace bodybuilder, but also runs her own fitness centre where she trains over 300 people, including men.
A closer look at India’s pride, Yashmeen Manak...

Yashmeen Manak

Yashmeen Manak is a Delhi born 36-year-old bodybuilder from India. 

Yashmeen Manak

Manak recently won the Bronze medal in the Miss Asia Bodybuilding competition. 

Yashmeen Manak

Earlier, she was also crowned as Miss India 2016, held by the Indian Bodybuilding Federation.

Yashmeen Manak

Yashmeen's journey as a body builder began after she faced major physical transformations during childhood. 

Yashmeen Manak

An ill-effect of a medication resulted in Manak losing enormous weight and loss of facial beauty. 

Yashmeen Manak

Disheartened by being termed 'ugly', Manak decided to work on her body and bring it back to fitness even if she couldn't do much about her facial features. 

Yashmeen Manak

Before one realised, her regular gym sessions turned into a love for bodybuilding. 

Yashmeen Manak

Having undergone several certified training courses over the years, Yashmeen soon participated in various bodybuilding competitions around the country. 

Yashmeen Manak

Manak soon won laurels in the field and she set out to open her own fitness centre. 

Yashmeen Manak

Today, she trains over 300 people, including men at her centre. 

Yashmeen Manak

Manak has the strong desire to train women in bodybuilding and get them interested in the same. 

Yashmeen Manak

Stating that women are hardly given an importance in the field, she intends to change the notion by doing her bit. 

Yashmeen Manak

Well, we sure do hope Manak inspires several other women with her journey! 

Yashmeen Manak



11.11.16

Aloe vera farmer became a crorepati

नौकरी छोड़ शुरू की एलोवेरा की खेती, ऐसे बन गया करोड़पति

नौकरी छोड़ शुरू की एलोवेरा की खेती, ऐसे बन गया करोड़पति

अक्सर हम ये देखते हैं किसान वर्ग के लोगों को सरकारी नौकरी मिल जाए तो किसानी करना छोड़ अपना पूरा जीवन सिर्फ नौकरी करने में बिता देते हैं। ऐसे में यदि कोई सरकारी नौकरी छोड़ कर किसानी करने लगे तो वाकई चौकाने वाली बात होगी। हरीश धनदेव सरकारी नौकरी से संतुष्ट न होने पर इस्तीफा देकर अपना करियर कृषि क्षेत्र की ओर ले जाने का निर्णय लिया और अब वह करोड़पति किसान हैं। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे उनके दिमाग में किसानी करने का ख्याल आया और जीवन का सफलतम फैसला लिया।

हरीश धनदेव एक बार सरकारी नौकरी के दौरान दिल्ली में 'कृषि एक्सपो' में पहुंचे, जहां उन्होंने देखा कि एलोवेरा की खेती करने से न सिर्फ आय में वृद्धि होगी बल्कि कृषि क्षेत्र में देश के विकास में भागीदारी भी होगी। इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया और एलोवेरा की खेती करने का निर्णय लिया। लगभग 120 एकड़ जमीन पर एलोवेरा समेत कई चीजों की खेती करना शुरू कर दिया। जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर धहिसर 'न्यूट्रीलो एग्रो' नाम से अपनी एक कंपनी खोली।

जहां बड़ी संख्या में एलोवेरा की खेती कर उसे बाबा रामदेव की पतंजलि कंपनी को बेचना शुरू किया। पतंजलि ने एलोवेरा के जूस तैयार करने के लिए अधिक मात्रा में एलोवेरा की जरूरत हो, जिसे हरीश ने अपनी खेती के जरिए पूर्ण उत्पादन निर्यात की।

कैसे बने करोड़पति?

एलोवेरा की पैदावार अधिकतर रेतीली क्षेत्रों में होती है। हरीश ने इसका फायदा उठाया और एलोवेरा की बड़े स्तर पर खेती की। इसकी मांग न सिर्फ राष्ट्रीय स्तर पर है बल्कि अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी है। हरीश द्वारा उगाए गए एलोवेरा की क्वालिटी बेहतरीन होने की वजह से पतंजलि ने भी मांग बढ़ा दी। इसका फायदा हरीश को इतना मिला कि वह कुछ ही महीनों में करोड़पति बन गए।

हरीश एलोवेरा के अलावा बाजरा, अनाज, मूंग आदि खाद्य पदार्थों की खेती किया। इन चीजों की मांग इतनी बढ़ गई कि न सिर्फ भारत में बल्कि ब्राजील, हांग-कांग और अमेरिका में भी निर्यात की जाने लगी।

80 हजार से 7 लाख पौधे लगाएं

शुरूआत में हरीश ने एलोवेरा के लगभग 80 हजार पौधारोपण करवाएं और धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर लगभग 7 लाख पौधे लगा दिए। हरीश ने बताया कि पिछले 4 महीनों के भीतर हरिद्वार में लगे पतंजलि फैक्टरियों में 125 से 150 टन एलोवेरा का निर्यात किया।


Success Story Of Ayesha Aziz

ये हैं भारत की सबसे कम उम्र की पायलट, मॉडलिंग की दुनिया से भी आते हैं ऑफर

Success Story Of Ayesha Aziz

वो कहते हैं न कि अगर ठान लिया जाए तो कुछ कर गुजरने से भगवान भी नहीं रोक सकते। ऐसा ही कुछ हुआ आयशा अजीज के साथ। बचपन से ही आयशा पायलट बनना चाहती थीं और उन्होंने कर भी दिखाया। 16 साल की उम्र में पायलट बनने वाली वो भारत की इकलौती महिला हैं।

Success Story Of Ayesha Aziz

16 साल की उम्र में ही आयशा ने स्टूडेंट पायलट लाइसेंस हासिल कर लिया था। जिस उम्र में बच्चे ये सोचते रह जाते हैं कि किस स्ट्रीम से पढ़ाई की जाए। उस उम्र में आयशा ने अपना सपना पूरा कर लिया।

Success Story Of Ayesha Aziz

आयशा बताती हैं कि उसके सपने को पूरा करने में परिवार ने भरपूर साथ दिया। जैसे ही उनके पिता को उनके सपने के बारे में पता चला उन्होंने तुरंत उन्हें फ्लाइंग स्कूल भेज दिया। उस समय उन्होंने दसवीं कक्षा पास की थी।

Success Story Of Ayesha Aziz

आयशा कश्मीर के बारामूला क्षेत्र के ख्वाजा गांव की रहने वाली हैं लेकिन फिलहाल वो मुंबई में रह रही हैं। आयशा सुनीता विलियम्स को अपना आदर्श मानती हैं। उन्हें नई जगहों पर घूमना और लोगों से मेलजोल बढ़ाना बहुत पसंद है।

Success Story Of Ayesha Aziz

आयशा ने अपने करियर की शुरुआत सेसना 152 और 172 एयरक्राफ्ट उड़ाकर की। वो अपनी प्रेरणास्रोत सुनिया विलियम्स से भी मिल चुकी हैं। वो बताती हैं कि मैं देश की सबसे कम उम्र की पायलट बनने की जगह अपने बचपन के टारगेट को पूरा करने पर बहुत खुश हूं। आपको बता दें कि आयशा कई मैगजींस के लिए फोटोशूट भी करा चुकी हैं। इसके अलावा वो सैनेटरी नैपकिन का भी एड कर चुकी हैं। 

Success Story Of K.jaiganesh

कभी करते थे वेटर का काम, आज हैं आईएएस अफसर

Success Story Of K.Jaiganesh

के जयगणेश का जन्म तमिलनाडु के उत्तरीय अम्बर के पास स्थित एक छोटे से गांव के एक गरीब परिवार में हुआ। पिता एक फैक्ट्री में काम करके किसी तरह परिवार का गुजारा चलाते थे। उनके 4 बच्चे थे जिनमें जयगणेश सबसे बड़े थे। जयगणेश पढ़ने में शुरू से ही बहुत होशियार थे। उन्होंने बारहवीं की परीक्षा 91% अंकों के साथ पास की। इसके बाद उनका तांथी पेरियार इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में एडमिशन हो गया जहां उन्होंने मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद उनकी नौकरी एक कंपनी में लग गई जहां उन्हें हर महीने 2500 रुपये मिलने लगे।

Success Story Of K.Jaiganesh

जयगणेश का मन नौकरी में नहीं लगा। उन्हें ये बात समझ में आ चुकी थी कि इस नौकरी के सहारे वो अपना और परिवार का गुजारा नहीं चला पाएंगे। उनका गांव भी बहुत गरीब था। वो अपने गांव के लिए भी बहुत कुछ करना चाहते थे। इसके लिए अच्छा सरकारी ओहदा पाना जरूरी था। उनके मन में ये विचार आया कि क्यों न सिविल सर्विसेज की तैयारी की जाए। उन्होंने जोर-शोर से पढ़ाई शुरू कर दी और इसकी परीक्षा भी दी। लेकिन हर बार वो असफल ही रहे। अपना खर्च चलाना भी मुश्किल हो रहा था।

Success Story Of K.Jaiganesh

अपना खर्च चलाने के लिए उन्होंने एक छोटे से होटल में वेटर की नौकरी करनी शुरू कर दी। वो दिन के समय वेटर का काम करते थे और रात के समय पढ़ाई। इसी दौरान उन्होंने इंटेलीजेंस ब्यूरो की परीक्षा दी और उसमें सफल भी हो गए। उनके सामने एक विकट समस्या खड़ी हो गई थी। वो समझ नहीं पा रहे थे कि नौकरी ज्वॉइन करें या फिर 7वीं बार सिविल की परीक्षा दें। 

Success Story Of K.Jaiganesh

अंत में उन्होंने निर्णय लिया की वो नौकरी नहीं करेंगे बल्कि अपनी तैयारी आगे जारी रखेंगे। उन्होंने सातवीं बार सिविल की परीक्षा दी और इस बार ऐसा कुछ हुआ जिसपर यकीन करना हर किसी के लिए मुश्किल था। उन्होंने इस परीक्षा में 156वीं रैंक हासिल की थी। उनकी मेहनत रंग लायी थी। खुद पर विश्वास ही उनकी सफलता की वजह बना।


Success Story Of Uppma Virdi

पूरा ऑस्ट्रेलिया है इस 'इंडियन चायवाली' का मुरीद, जानिए इसकी कहानी

 Success Story Of Uppma Virdi


कोई भी काम छोटा नहीं होता। इस बात को साबित किया है पेशे से वकील उपमा विर्दी ने। उपमा का जन्म चंडीगढ़ में हुआ और फिलहाल वो ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में रहती हैं। इन्होंने ऑस्ट्रेलिया में अपना चाय का बिजनेस शुरू किया और अब पूरा ऑस्ट्रेलिया इनकी चाय का मुरीद हो गया है।

Success Story Of Uppma Virdi

उपमा को चाय बेचने का आइडिया अपने दादाजी से मिला। उनके दादाजी चंडीगढ़ में आयुर्वेदिक दवाएं बेचते थे। उनके दादाजी ने ही बताया कि चाय में कौन कौन से मसाले किस मात्रा में डालने चाहिए।

Success Story Of Uppma Virdi

ऑस्ट्रेलिया में टी फेस्टिवल के दौरान उन्होंने कहा- 'मैं आस्ट्रेलिया के लोगों को बताना चाहती हूं कि भारतीय चाय का स्वाद दुनिया के बाकी देशों की चाय से अलग है, क्योंकि हम भारतीय चाय को और स्वादिष्ट बनाने के लिए उसमें इलायची, लौंग तथा कई तरह की बूटियों का प्रयोग करते हैं।' 

Success Story Of Uppma Virdi

अपने दादाजी की मसाला चाय को पूरे दुनिया में पहचान दिलाने के लिए वो अपनी नौकरी से बचे समय में अपनी चाय दफ्तरों, रेस्टोरेंट, शॉपिंग मॉल्स, कैफे में पहुंचाती हैं। एसबीएस से हुई बातचीत में विरदी ने बताया कि जब वो ऑस्ट्रेलिया आईं तब उन्हें घर की बनी चाय की बहुत याद आने लगी और तभी उन्होंने इस बिजनेस के बारे में सोचा।

Success Story Of Uppma Virdi

उपमा ने चाय का बिजनेस 2 साल पहले शुरू किया था। इन्होंने सोशल मीडिया कैंपेन के जरिए चाय बेचने की शुरुआत की थी। वो बताती हैं शुरुआत में उनके माता पिता को इस पेशे से आपत्ति हुई लेकिन उन्होंने उन्हें समझाया कि वह दुनिया को दिखा देना चाहती हैं कि चायवाले भी कुछ कर सकते हैं।